तिल

तिल भारत की एक महत्वपूर्ण तिलहन फसल है और खाद्य तेल व इसके सह-उत्पादों के लिए इसे अत्यधिक उपयोगी माना जाता है।

यह शुष्क भूमि की खेती और कम उपजाऊ मिट्टी के लिए भी उपयुक्त है, जिससे यह छोटे किसानों के लिए बेहद मददगार साबित होती है।
तिल पोषण सुरक्षा में भी योगदान देता है क्योंकि इसके बीज तेल और प्रोटीन से भरपूर होते हैं।

आपके तिल को फॉस्फोरस की आवश्यकता क्यों है?

जड़ों का विकास और
सूखा सहनशीलता

फॉस्फोरस जड़ों के मजबूत विकास को बढ़ावा देता है, जिससे फसल को सूखे की स्थिति को सहन करने और मिट्टी की नमी का कुशलतापूर्वक उपयोग करने में मदद मिलती है।

शुरुआती विकास और
फूल आना

यह ऊर्जा हस्तांतरण (ATP) में सहायता करता है, जिससे पौधों को शुरुआती चरणों में बेहतर मजबूती मिलती है और फूल आने व ढेरी/कैप्सूल बनने की प्रक्रिया बेहतर होती है।

बीजों का विकास और
तेल की मात्रा

पर्याप्त मात्रा में फॉस्फोरस मिलने से बीजों का भराव बेहतर होता है, कुल उपज बढ़ती है और इसके साथ ही तेल की मात्रा तथा उसकी गुणवत्ता में भी सुधार होता है।
झारखंड पश्चिम बंगाल

तिल

खाद की सही मात्रा (किलो प्रति हेक्टेयर)

नाइट्रोजन

40-60

फॉस्फोरस

20-30

पोटेशियम

20-30

सूक्ष्मपोषक

अनुपलब्ध

TSP डोज़: P की आवश्यकता हेतु (किलो प्रति हेक्टेयर)

डोज़

65

इस्तेमाल का सही तरीका

बुआई के समय छिड़काव करके

चयनित राज्य: पश्चिम बंगाल

मुख्य उत्पादक राज्य: झारखंड, पश्चिम बंगाल

स्रोत: फसल की जानकारी

स्रोत: राज्यानुसार जानकारी